ठलहा तै होबे मयारू दाई /गायक - गुड्डा साहू /जस सेवा गीत

🌼 ठलहा तै होबे मयारू दाई / गुड्डा साहू / जस सेवा गीत 🌼

Thalha tai hobe मयारु दाई

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गीत - ठलहा तै होबे मयारू दाई 

गायक - गुड्डा साहू 

गीतकार - गुड्डा साहू 

यूट्यूब - बबला साहू 

वेबसाइट ऑनर -कैलाश पंचारे 

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मुखड़ा 

 ठलहा तै होबे मयारू दाई वो 

चले आबे ऐती ,ठलहा तै होबे मयारू दाई-2 

अंतरा -1 

नई हे मोर घर मा दाई ,कही आनी बानी 

नीचट गरीब हव दाई ,करथव किसानी 

जाता में दर के राखेव ,हवव मैं पिसानी 

बंगला चटनी संग मा चीख लेबे दाई 

उड़ान - पुराये हव मैंहा अंगाकर रोटी वो ,चले आबे ऐती--- 

 ठलहा तै होबे मयारू दाई 

 ठलहा तै होबे मयारू दाई वो 

चले आबे ऐती ,ठलहा तै होबे मयारू दाई-2 

अंतरा -2 

गंजी ला मांग के दाई लाने हव मै उधारी 

कहां के पाहू दाई बड़ा अउ सुहारी 

कइसे मोर जिनगी पहाथे देख महतारी 

लुगरा पोलखा देहु कहा ले तोला मै निसानी 

उड़ान - कुरता पहिरे हावव चिरहा धोती वो ,चले आबे ऐती--- 

 ठलहा तै होबे मयारू दाई--- 

 ठलहा तै होबे मयारू दाई वो 

चले आबे ऐती ,ठलहा तै होबे मयारू दाई-2 

अंतरा -3  

कइसे दरस ला दाई मैंहा तोर पाहू 

धोके तोर गोड़ ला दाई मैंहा तर जाहु 

जिनगी के काहे भरोसा कब मर जाहु 

आबे मोर घर मा दाई भेंट का चघाहू 

उड़ान - झुंगू मा नई हे हीरा मोती वो ,चले आबे ऐती--- 

 ठलहा तै होबे मयारू दाई--- 

 ठलहा तै होबे मयारू दाई वो 

चले आबे ऐती ,ठलहा तै होबे मयारू दाई-2

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गीत के भावार्थ

ठलहा तै होबे मयारू दाई” एक अइसन भक्ति गीत आय जेमां एक गरीब किसान अपन दाई (माता रानी) ल अपन घर आके आशीर्वाद देय बर बिनती करत हे। गीत के हर पंक्ति मं सच्चा प्रेम, श्रद्धा अउ समर्पण के भावना झलकथे।

भक्त कहिथे कि ओकर घर धन-दौलत ले भरपूर नइये। न महल हवय, न बड़े-बड़े पकवान हवय। वो त एक साधारण किसान आय, जऊन दिन-रात मेहनत करके अपन परिवार चलाथे। फेर वोला भरोसा हवय कि दाई अपन भक्त के प्रेम ल देखथे, धन-संपत्ति ल नइ।

गीत मं किसान माता ल कहिथे कि मोर घर मं अंगाकर रोटी, बंगला चटनी अउ साधारण भोजन हवय। जऊन कुछ हवय, वोला प्रेम ले परोसहूं। मोर घर छोटे हो सकथे, फेर मोर मन मं तोर बर अथाह श्रद्धा हवय।

दूसर अंतरा मं किसान अपन गरीबी के हालत बताथे। वो कहिथे कि उधार ले कुछ व्यवस्था करे हवंव, फेर मोर बस मं बड़े-बड़े पकवान बनाना नइये। मोर कपड़ा घलो फटे-पुराने हवंय, फेर मोर मन साफ हवय।

तीसर अंतरा मं जीवन के अस्थिरता के बात आय। किसान सोचथे कि जिनगी के कोनो भरोसा नइये। एही से वो माता ल कहिथे कि मोर जीते जी एक बेर मोर घर जरूर आ जा। मोर कोठी मं हीरा-मोती नइये, फेर मोर हृदय भक्ति अउ प्रेम ले भरपूर हवय।

ए गीत हमन ला सिखाथे कि माता रानी बर सबसे बड़ा भोग सोना-चांदी नइ, बल्कि निष्कपट प्रेम, श्रद्धा अउ विश्वास आय।


गीत के विशेषता 

1. ग्रामीण जीवन के सजीव चित्रण

ए गीत मं छत्तीसगढ़ के किसान जीवन के सुंदर झांकी देखे ला मिलथे। खेती-किसानी, सादा भोजन अउ संघर्षपूर्ण जीवन के सच्चा चित्रण करे गे हवय।

2. सच्ची भक्ति के संदेश

गीत बताथे कि माता रानी धनवान अउ गरीब मं भेदभाव नइ करय। जेकर मन मं सच्ची श्रद्धा रहिथे, माता ओखर ऊपर कृपा करथे।

3. सरल अउ मधुर भाषा

गीत के शब्द सरल छत्तीसगढ़ी मं लिखे गे हवंय। एखर भाषा सीधे श्रोता के हृदय ल छू लेथे।

4. विनम्रता के उत्कृष्ट उदाहरण

भक्त अपन गरीबी छुपाथे नइ, बल्कि माता के आगू सच्चाई रखथे। ए विनम्रता गीत ल अउ अधिक प्रभावशाली बनाथे।

5. लोक संस्कृति के परिचय

अंगाकर रोटी, बंगला चटनी, लुगरा-पोलखा जइसन शब्द छत्तीसगढ़ी संस्कृति अउ परंपरा के सुंदर परिचय देवत हवंय।

6. भावनात्मक गहराई

गीत सुनके अइसन लगथे जइसे एक भक्त अपन मां संग सीधे बात करत होय। ए आत्मीयता गीत के सबसे बड़ी ताकत आय।

मयारू दाई के आगमन

बहुत पुराना बात आय। छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव मं राम नाम के किसान रहत रहिस। ओखर परिवार बहुत गरीब रहिस। माटी के घर, खपरैल के छानी अउ दू एकड़ खेत लेच ओखर पूरा संसार चलत रहिस।

राम  रोज बिहान ले खेत जाथे, कड़ी मेहनत करथे, फेर मौसम के मार अउ गरीबी के कारण घर के हालत सुधर नइ पावत रहिस। गांव के कुछ लोग धनवान रहिन। नवरात्रि मं बड़े-बड़े पंडाल सजावत रहिन, महंगा भोग चढ़ावत रहिन। फेरराम  के घर मं अइसन कोनो साधन नइ रहिस।

फेरराम के मन मं माता रानी बर अगाध श्रद्धा रहिस। वो कहत रहिस—

"दाई धन-दौलत नइ देखय, दाई त अपन भक्त के मन देखथे।"

एक दिन नवरात्रि शुरू होइस। गांव भर मं माता के जस गूंजे लगिस। राम  घलो अपन घर के कोठा मं एक छोटकुन दिया बारिस अउ माता ल प्रणाम करके कहिस—

"दाई, मोर घर गरीब हो सकथे, फेर मोर मन गरीब नइये। एक बेर मोर घर घलो आ जा।"

ओ दिन ले राम रोज माता के जस गावत रहिस—

"ठलहा तै होबे मयारू दाई वो, चले आबे ऐती..."

गांव वाले के हंसी

जब गांव वाले राम के जसगीत सुनिन त कुछ लोग हंस पड़े।

एक आदमी कहिस—

"अरे राम तोर घर मं न मिठाई हवय, न फल-फूल। माता तो बड़े-बड़े मंदिर मं जाही।"

राम मुस्कुराके कहिस—

"माता बर प्रेम चाही, पकवान नइ।"

गांव वाले फेर हंसिन, फेर राम अपन भक्ति मं डटे रहिस।

एक रहस्यमयी बुजुर्ग महिला

नवरात्रि के सातवां दिन सांझ के बेरा जोरदार पानी गिरना शुरू होगे। बिजली चमकय लागिस। राम अपन घर के आंगन मं दिया बचावत रहिस।

तभी ओखर घर के दुआरी मं एक बुजुर्ग महिला आके खड़े होगे।

महिला कहिस—

"बेटा, बहुत भूख लागे हवय। कुछ खाय बर मिल जाही का?"

राम बिना देर करे कहिस—

"दाई, मोर घर मं कुछ खास नइये, फेर जऊन हवय वो तोर आय।"

ओ घर के भीतर ले अंगाकर रोटी, बंगला चटनी अउ गंजी ले आइस। बड़े आदर ले महिला के आगू रख दिस।

महिला मुस्कुराइस अउ कहिस—

"बेटा, तैं खुद खाबे का?"

राम कहिस—

"पहिली मेहमान खाही, फेर हमन खाबो।"

महिला के आंखी मं खुशी झलक उठिस।

अनोखा आशीर्वाद

महिला भोजन खाके कहिस—

राम, तैं मोला पहचानस?"

राम  कहिस—

"नइ दाई, फेर मोर बर तैं माता समान हवस।"

महिला मुस्कुराइस।

अचानक घर मं एक अद्भुत प्रकाश फैल गे। पूरा कमरा उज्ज्वल होगे।

राम  देखिस कि बुजुर्ग महिला के स्थान मं माता रानी के दिव्य स्वरूप विराजमान हवंय।

राम  के आंखी ले आंसू बहना शुरू होगे।

वो माता के चरण मं गिर पड़िस।

माता कहिन—

राम  तैं मोला महल के भोग नइ, प्रेम के भोग चढ़ाय हस। मोर बर एही सबसे बड़ा प्रसाद आय।"

माता के वरदान

माता कहिन—

"मांग बेटा, का मांगथस?"

राम हाथ जोड़के कहिस—

"दाई, मोला धन नइ चाही। बस मोर गांव के सब झन सुखी रहंय।"

माता मुस्कुराइन।

"जेकर मन मं दूसर बर भलाई होथे, ओला मैं खाली हाथ नइ छोड़ंव।"

माता आशीर्वाद देके अंतर्ध्यान होगिन।

चमत्कार

दूसर दिन बिहान जब राम  खेत गीस त देखिस कि सूखे पड़े फसल मं नई हरियाली आ गे हवय।

कुछ महीना बाद भरपूर उपज होइस।

राम  के घर के गरीबी धीरे-धीरे दूर होगे।

फेर सबसे बड़ी बात ए रहिस कि राम  के मन मं घमंड कभू नइ आइस।

वो हर साल नवरात्रि मं अंगाकर रोटी अउ बंगला चटनी के भोग लगावत रहिस।

गांव के बदलाव

जब गांव वाले ए घटना सुनिन त सबके सोच बदल गे।

जऊन लोग धन के घमंड करत रहिन, ओमन समझ गइन कि माता रानी सच्चा प्रेम ल स्वीकार करथे।

गांव के हर घर मं भक्ति अउ सेवा के भावना बढ़ गे।

अब गांव के लोग गरीब-अमीर के भेदभाव कम कर दिन।

कथा के संदेश

ए कथा हमन ला सिखाथे कि—

  • माता रानी धन-दौलत नइ, मन के सच्चाई देखथे।
  • प्रेम ले चढ़ाय गे छोट से छोट भोग घलो माता ल प्रिय लागथे।
  • भक्ति मं दिखावा के कोनो जगह नइये।
  • गरीब मनखे के सच्चा श्रद्धा भगवान तक जरूर पहुंचथे।
  • जे दूसर के भलाई चाहथे, भगवान ओखर ऊपर विशेष कृपा करथे।

"ठलहा तै होबे मयारू दाई" 

गीत के असली संदेश एही आय कि माता रानी बर हीरा-मोती ले बढ़कर भक्त के निष्कपट प्रेम अउ विश्वास होथे। जय माता दी। 🙏🌺

🌼 माता रानी आप सब की मनोकामना पूर्ण करें 🌼

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