मान जाना दाई ओ - दिवेश साहू/ गीतकार - गौतम गुरूजी /cgjaslyrics
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गीत-मान जाना दाई ओ
गायक - दिवेश साहू
गीतकार - गौतम गुरूजी
म्यूज़िक कंपनी - महतारी सेवा
वेबसाईट ऑनर-कैलाश पंचारे
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मुखड़ा
मान जाना दाई वो, मान जाना वो
आरती थारी हुम अगियारी, खाड़ा खप्पर तोर दुवारी
झन रिसियाना... झन रिसियाना दाई वो मान जाना वो
मान जाना दाई वो, मान जाना वो
अंतरा 1
का मंतर जंतर मा दाई, मै हर तोला रिझावव माँ
नई जनाव तोर मान मनौती, कइसे के तोला मनावव माँ
तोर सेवा बर ओसरी पारी, सकलायें सगरो नर नारी
अब थिरयाना ... अब थिरयाना दाई वो मान जाना वो
दाई वो मान जाना वो,मान जाना वो
अंतरा 2
दसो अंगूरी ले घेरी बेरी, नत नत अरजी गुजारव वो
मन मंदिर में तोरे नाव के ,सरधा के दियना बारव वो
तीही दुनिया के हस रखवारी,कतको रूप के सिरजनहारी
मोरो पतियाना.... मोरो पतियाना.....दाई वो मान जाना वो
दाई वो मान जाना वो,मान जाना वो
अंतरा 3
दिये अन धन परसादी, तोहिच बर ओ चधाये हव
नरियर भेला पान सुपारी, काँचा लिमऊ मढाये हच मेंस
कारी पिंयर चाऊर भारी, बनथे बनॉकि तोर सहारी।
झन चिचियाना...झन चिचियाना दाई वो मान जाना वो
दाई वो मान जाना वो,मान जाना वो
अंतरा 4
मया के पवरित निज़मल बंधना दाई तीही गढ़ियाये वो
फेर काबर दुलरू लाईक बर माता तै रसियाये वो
शांत होंगे जग़ के महतारी ,गौतम दरश दरश बलिहारी
तै सूरताना...तै सूरताना दाई वो मान जाना वो
दाई वो मान जाना वो,मान जाना वो
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गीत के अर्थ (छत्तीसगढ़ी म)
"मान जाना दाई वो" एक विनती अउ समर्पण के जसगीत आय। ए गीत म भक्त अपन महतारी देवी ले हाथ जोड़के कहिथे कि हे दाई! मोर आरती, पूजा, नारियल, पान-सुपारी अउ श्रद्धा ला स्वीकार कर, मोर ऊपर रिसाय झन।
गीत म भक्त बार-बार दाई ले निवेदन करथे कि वो अपन कृपा दृष्टि रखय, काबर कि संसार के सबो नर-नारी ओखर दुवारी म आके अपन दुख-दर्द कहिथें। ए गीत भक्त अउ माता के बीच के अटूट मया, विश्वास अउ भक्ति के प्रतीक आय।
गीत के विशेषता
✅ देवी माता के प्रति गहरी श्रद्धा अउ समर्पण दिखथे।
✅ जसगीत म विनम्रता अउ भक्ति भाव के सुंदर चित्रण मिलथे।
✅ माता के पूजा सामग्री जइसे नारियल, पान, सुपारी, चाऊर, नींबू आदि के उल्लेख पारंपरिक संस्कृति ला दर्शाथे।
✅ गीत म भक्त के पीरा अउ माता ले आसरा मांगने के भाव मन ला सहज रूप म प्रस्तुत करे गे हे।
✅ नवरात्रि, जवारा, माता सेवा अउ जस-जागरण म ए गीत खूब गाये जाथे।
कथा : दाई के मान मनौती
बहुत बछर पहिली एक गरीब भक्त रहिस। वो हर रोज देवी दाई के मंदिर जाके आरती करय, फेर ओकर जीवन म दुःख कम नई होवत रहिस।
एक दिन वो मंदिर के आंगन म खड़े होके रोवत-रोवत कहिस –
"दाई! आरती थारी हुम अगियारी, खाड़ा खप्पर तोर दुवारी, झन रिसियाना दाई..."
ओकर आंखी ले आंसू झरत रहिस। वो अपन सामर्थ्य अनुसार नारियल, पान-सुपारी, चाऊर अउ नींबू चढ़ाइस।
दाई ओकर सच्चा भक्ति ला देखिस। कुछे दिन बाद ओकर जीवन के कठिनाई धीरे-धीरे दूर होय लागिस। खेती लहलहाय लगिस, परिवार म सुख-शांति आइस अउ गांव भर म ओकर भक्ति के चर्चा होय लागिस।
तब ओ भक्त समझिस कि माता ला धन-दौलत नई, बल्कि सच्चा मन अउ श्रद्धा चाही।
एही संदेश ए जसगीत हमन ला देथे कि जब मन ले भक्ति करे जाथे, त माता जरूर अपन भक्त के पुकार सुनथे।
गीत के संदेश
सच्चा मन ले करे गे पूजा कभी व्यर्थ नई जाथे।
माता अपन भक्त मन के दुख हरथे।
श्रद्धा अउ विश्वास सबसे बड़े चढ़ावा आय।
देवी भक्ति म अहंकार नई, विनम्रता जरूरी हे।
माता के दुवारी सबो झन बराबर हवंय।
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