bhagwati bhawani haa/भगवती भवानी हा/rajesh sinha jas lyrics
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गीत - भगवती भवानी हा
गायक - राजेश सिन्हा
गीतकार - चंद्रकांत बघधर्रा
म्यूज़िक कंपनी-kk casette
वेबसाईट ऑनर - कैलाश पंचारे
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मुखड़ा
भगवती भवानी हा भगवान शिव ला खागे -2
उड़ान -हो देखे मा घलो कईसन -2
कईसन दिन हा आगे
हो देखे मा घलो कईसन कईसन दिन हा आगे
अंतरा -1
भूख बड़े दुनिया मा रे पापी पेट कराथे पाप
धरम करम मरजात ला भरके गोरसी मा देथे ताप
कहे सुने मा सिरतो रे बैरी हिरदे जाथे काँप
सत परती सत सत गोठाने नई मारव मैं खाप
उड़ान -जगजननी अम्बा ला-2
कईसे कहुँ नई लागे
भगवती भवानी हा भगवान शिव ला खागे -2
अंतरा -2
तहिआ समय के कथा सुनानव शिव जी समाधि लगाय
नून तेल चऊर दाल बिना अउ हड़िया कलौंजी खपलाय
राज घराना के उमा दुलौरिन भूख मरत हे रहाय
करही जुगाड़ जोड़ी हर गुण के तपले शिव ला ऊंचाय
उड़ान -जगाये ले जगदम्बा -2,
शिव शंकर नी जागे
भगवती भवानी हा भगवान शिव ला खागे -2
अंतरा -3
चोला चुरत हे भूख प्यास मा लागे गज़ब खिसीयानी
ऐड़ी के रिस हा तरवां मा चढ़ गे बही बरोबर बानी
कट काटात दौड़े ललियाके भोला डेहर मा शिवानी
नई हे कही ता ख़ाहु मै तोला सुन मोर अवघड़ दानी
उड़ान -कल कलहीन काय करे-2,
गजबे के ख़खवागे
भगवती भवानी हा भगवान शिव ला खागे -2
अंतरा -4
लील डारिस भोले नाथ ला सहीगो भूख मर रिन भवानी
ले डकार जब मईया मुख ले धुआं धुआं जग भर छाई
जेहि दिन ले परबतिया के बेटियां धुंआवती कहाई
दस विद्या म एक विद्या के सातवां संतो जनाई
उड़ान - जिंगगी भर जीयत ले -2,
धनी ले ओ अगुवागे
भगवती भवानी हा भगवान शिव ला खागे -2
अंतरा -5
सदा सुहागी सतवंतिन दिखे माता राड़ी रति के
रहत अजर अमर ओ अभागीन अविनाशी ओ पति के
रथ चढ़े कर धुआं धरे सादा लुगरा सती के
राजेश गावे महिमा जस मा मईया धुआं वती के
उड़ान- ब्रह्मा हा लिखे हे ता-2,
सुन बघधर्रा गा के
भगवती भवानी हा भगवान शिव ला खागे -2
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कारी मा बीरबिट काली माता कलकत्ता वाली जसगीत
डग डमरू बाजे डगरे डगरे डग हा माता जसगीत
माटी के दाई दुर्गा गढ़ गढ़ तोला बनाव जसगीत
गरजत आये महामाया करताल वाले जसगीत
मलनिया गूथ देना मोर दुर्गा दाई बर फुलवा के हार
इस जसगीत में माँ भगवती के धूमावती स्वरूप की कथा बताई गई है। गीत में कहा गया है कि एक समय ऐसा आया जब दुनिया में भयंकर भूख फैल गई। लोग धर्म-कर्म भूलकर सिर्फ पेट भरने की चिंता में पड़ गए। उस समय भगवान शिव समाधि में बैठे थे और माता पार्वती (भवानी) भी उनके साथ थीं।
भूख इतनी बढ़ गई कि माता पार्वती से सहन नहीं हुआ। उन्होंने शिव जी को जगाने की कोशिश की लेकिन शिव जी समाधि में ही रहे। भूख से परेशान होकर माता का क्रोध बढ़ गया और अंत में उन्होंने भगवान शिव को ही निगल लिया।
जब माता ने शिव जी को निगल लिया, तब उनके मुख से धुआँ निकलने लगा। उसी समय माता का नया रूप प्रकट हुआ जिसे "धूमावती" कहा गया। यह देवी का एक उग्र और रहस्यमयी स्वरूप है। यह रूप जीवन के दुख, अभाव और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है।
गीत में आगे बताया गया है कि माँ धूमावती विधवा स्वरूप में रहती हैं, सफेद वस्त्र पहनती हैं और धुएँ से घिरी रहती हैं। वे दस महाविद्याओं में से एक हैं और संकट में फँसे लोगों की रक्षा करती हैं।
यह गीत माँ धूमावती की दुर्लभ कथा बताता है
देवी के उग्र और रहस्यमयी रूप का वर्णन है
भूख और वैराग्य का आध्यात्मिक संदेश देता है
दस महाविद्याओं में धूमावती का महत्व बताता है
छत्तीसगढ़ी लोक परंपरा का सुंदर उदाहरण है
बहुत पुराने समय की बात है। एक बार संसार में भयंकर अकाल पड़ गया। धरती सूख गई, न खेतों में अनाज हुआ और न जंगलों में फल-फूल। हर तरफ भूख ही भूख फैल गई। लोग परेशान हो गए। अमीर हो या गरीब, हर किसी की हालत खराब थी।
उसी समय कैलाश पर्वत पर भगवान शिव गहरी समाधि में बैठे थे। उनके पास माता पार्वती भी थीं। माता पार्वती अपने भोलेनाथ को देख रही थीं। समय बीतता गया, लेकिन शिव जी समाधि से बाहर नहीं आए।
उधर दुनिया में भूख बढ़ती जा रही थी। माता पार्वती को भी भूख लगने लगी। पहले तो उन्होंने सहन किया, लेकिन धीरे-धीरे भूख असहनीय हो गई। उन्होंने शिव जी को जगाने की कोशिश की।
"प्रभु, उठिए... मुझे बहुत भूख लगी है।"
लेकिन शिव जी समाधि में लीन थे। कोई जवाब नहीं मिला।
माता ने फिर कहा —
"भोलेनाथ, कुछ व्यवस्था कीजिए, दुनिया भी परेशान है और मैं भी।"
फिर भी शिव जी शांत बैठे रहे। अब माता की भूख गुस्से में बदलने लगी। उनका चेहरा बदलने लगा। आंखों में तेज आ गया।
उन्होंने तीसरी बार शिव जी को झकझोरा।
लेकिन कोई असर नहीं हुआ।
अब माता पार्वती का धैर्य टूट गया। भूख इतनी बढ़ गई कि उन्हें कुछ समझ नहीं आया। क्रोध और भूख के मिलन से उनका रूप बदलने लगा।
अचानक माता ने ऐसा काम कर दिया जिसे देखकर पूरा ब्रह्मांड हिल गया।
उन्होंने भगवान शिव को ही निगल लिया।
जैसे ही माता ने शिव जी को निगला, उनके शरीर में एक अलग ऊर्जा फैल गई। उनके मुख से धुआँ निकलने लगा। चारों तरफ धुआँ ही धुआँ छा गया। आसमान काला पड़ गया।
देवता घबरा गए।
इंद्र बोले — "ये क्या हो गया?"
ब्रह्मा जी चिंतित हो गए।
विष्णु जी भी आश्चर्य में पड़ गए।
तभी माता का नया रूप प्रकट हुआ। बाल बिखरे हुए, चेहरे पर तेज, शरीर पर साधारण वस्त्र, और चारों तरफ धुआँ।
यह था माता का धूमावती रूप।
माता अब शांत खड़ी थीं। उन्होंने शिव जी को अपने भीतर धारण किया हुआ था। यह रूप वैराग्य और त्याग का प्रतीक था।
देवताओं ने पूछा —
"माता, यह कैसा रूप है?"
माता बोलीं —
"जब भूख और दुख बढ़ता है, तब जीवन का सच्चा स्वरूप सामने आता है। मैं उसी सत्य का रूप हूँ।"
कुछ समय बाद माता ने शिव जी को बाहर निकाला। शिव जी मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा —
"देवी, यह तुम्हारा धूमावती रूप संसार को जीवन का सत्य सिखाएगा।"
तभी से माता का यह रूप पूजनीय हो गया।
लोग उन्हें धूमावती माता कहने लगे।
माता धूमावती का स्वरूप अलग माना जाता है। वे सादगी में रहती हैं। सफेद वस्त्र पहनती हैं। उनका वाहन रथ माना जाता है। वे दुख और कष्ट दूर करने वाली देवी मानी जाती हैं।
कहा जाता है कि जो व्यक्ति जीवन में निराश हो जाता है, दुख से घिर जाता है, उसे माता धूमावती की पूजा करनी चाहिए। माता उसे शक्ति देती हैं।
छत्तीसगढ़ में यह कथा जसगीत के रूप में गाई जाती है। गायक इस कथा को गाकर बताते हैं कि जीवन में सुख-दुख दोनों आते हैं। भूख, गरीबी और दुख भी जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन देवी शक्ति हर समय साथ रहती हैं।
गीत का संदेश है कि जब जीवन में कठिन समय आए, तब घबराना नहीं चाहिए। वह समय भी बीत जाता है और देवी शक्ति हमें संभाल लेती हैं।
इस तरह यह जसगीत सिर्फ कहानी नहीं बल्कि जीवन का गहरा संदेश देता है।
माँ धूमावती का यह रूप हमें सिखाता है कि दुख में भी शक्ति छिपी होती है।
और यही कारण है कि आज भी लोग गाते हैं —
"भगवती भवानी हा भगवान शिव ला खागे..."



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