जुड़वास मनाये वो | रामकुमार यादव | आषाढ़ महीना शीतला माता जुड़वास जस गीत | CG Jas Lyrics
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गीत -जुड़वास मनाये वो
गायक -रामकुमार यादव
म्यूजिक लेबल -जुड़वास जस गीत
यूट्यूब - सुमिरन भक्ति माला
वेबसाइट ऑनर -कैलाश पंचारे
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मुखड़ा
जुड़वास मनाए ओ जुड़वास मनाए ना
आषाढ़ महीन मईया तोर जुड़वास मनाए ओ
उड़ान - गांव बस्ती के सबझन मिलके
माथ नवाये वो
आषाढ़ महीन मईया तोर जुड़वास मनाए ओ
अंतरा -1
दाई तोर मंदिर ल लिपाये पोतायेव
जगमग दियना जलायेव
उड़ान - गजमोतियन ले अंगना म दाई
चौक पुरायेव वो
आषाढ़ महीन मईया तोर जुड़वास मनाए ओ
अंतरा -2
आवव आके बैठो दाई आसन बिसायेव हव
चरण पखारे बर गंगा जल लाये हव
उड़ान - चंदन बंदन फूल दसमत के
तोला चघाये वो
आषाढ़ महीन मईया तोर जुड़वास मनाए ओ
अंतरा -3
पाठ पूजा करत हावव बईगा अउ गुनिया मन
लइका पिचका नर नारी बइठे हे सिंहासन
उड़ान - सुनले अउ अर्जी विनती ल
तोला गोहराये वो
आषाढ़ महीन मईया तोर जुड़वास मनाए ओ
अंतरा -4
हरदी के पानी अउ निमुआ के डारा
बईगा हा सिचय पानी सबला डारा डारा
उड़ान - मन ला शांत करव माँ शीतला
तन ला जुड़ाये वो
आषाढ़ महीन मईया तोर जुड़वास मनाए ओ
अंतरा -5
मै तो नई जानव दाई तोर सेवा के मरम ला
गावत हावव जस हिन्दू के धरम ला
उड़ान - पड़े शरण में राम कोसरिया
आशीष बरसाये वो
आषाढ़ महीन मईया तोर जुड़वास मनाए ओ
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गीत के अर्थ (छत्तीसगढ़ी म)
"जुड़वास मनाये वो" सिरिफ एक जस गीत नई हे, ए हमर छत्तीसगढ़ के लोक आस्था, संस्कृति अउ शीतला दाई के भक्ति के जीयत-जागत चिन्हा आय। गीत म गायक बताथे कि आषाढ़ महीना लगतेच गांव के सबो झन एक संग जुटके शीतला दाई के जुड़वास मनाथें। मंदिर ल लीप-पोत के, चौक पुरके, दीप जलाके, गंगा जल, चंदन, फूल अउ नीम-हरदी ले दाई के पूजा करे जाथे।
ए गीत के असली संदेश ये आय कि सच्चा मन, सेवा, एकता अउ श्रद्धा ले करे गे पूजा सबसे बड़े चढ़ावा होथे। शीतला दाई ले गांव के सुख, शांति, रोग-दुख ले रक्षा अउ परिवार के मंगल के कामना करे जाथे। जुड़वास सिरिफ एक पर्व नई, बल्कि गांव-समाज ल एक डोरी म बांधे वाला लोक संस्कार आय।
गीत के विशेषता (छत्तीसगढ़ी म)
ए गीत म शीतला दाई के जुड़वास पर्व के परंपरा के सुंदर चित्रण मिलथे।
गांव के एकता, भाईचारा अउ सामूहिक पूजा के भाव ल उभारथे।
हरदी, नीम, गंगा जल, चंदन अउ दीपक जइसन लोक परंपरा के महत्व बताथे।
छत्तीसगढ़ के संस्कृति, लोक विश्वास अउ देवी भक्ति के जीवंत रूप ल दिखाथे।
गीत के शब्द सरल, मधुर अउ भक्तिमय हवंय, जेन ला हर उमर के मनखे गा सकथे।
जुड़वास पर्व म गाये जाय वाला ए गीत श्रद्धा, शांति अउ सेवा के संदेश देथे।
कथा – जुड़वास मनाये वो (छत्तीसगढ़ी लोककथा)
आषाढ़ महीना के पहिली बरखा धरती ऊपर गिरिस। खेत-खार हर हरियर होवत रहिस। गांव के गली, चौरा अउ मंदिर म एक अलगच रौनक दिखत रहिस। हर घर के माई-बहिनी कहत रहिन – "ए साल जुड़वास धूमधाम ले मनाबो, शीतला दाई ल मनाबो।"
गांव के बीचो-बीच एक पुराना मंदिर रहिस। कहे जाथे कि बरसों पहिली गांव म चेचक अउ कई किसिम के बीमारी फैल गे रहिस। तब गांव के बुजुर्ग मन शीतला दाई के अराधना करिन। दाई के कृपा ले गांव धीरे-धीरे बीमारी ले मुक्त होगे। ओही दिन ले गांव म जुड़वास मनाय के परंपरा सुरू होइस।
जुड़वास के बिहान सबो झन सूरज उगे के पहिली उठ गिन। घर-दुआर ल साफ करे गीस। मंदिर ल गोबर अउ माटी ले लीपे गीस। आंगन म चावल के आटा ले सुंदर चौक पुरे गीस। छोटे-छोटे लइका मन फूल बटोरे बर निकर गिन।
गांव के दाई-बहिनी मन मिलके जस गीत गावत मंदिर पहुंचिन। कऊनो आरती के थारी लाने रहिस, कऊनो दीपक, कऊनो नारियल अउ कऊनो गंगा जल। मंदिर के वातावरण भक्ति ले भर गे।
बईगा पूजा सुरू करिस। शीतला दाई के चरण म गंगा जल चढ़ाइस। चंदन, फूल, अगरबत्ती अउ दीप अर्पित करे गीस। गांव के बूढ़ा-बुजुर्ग हाथ जोड़के कहिन – "दाई, हमर गांव ल रोग-दुख ले बचाय रखिहा।"
पूजा के बाद हरदी के पानी अउ नीम के डारा ले गांव भर म छिड़काव करे गीस। छोटे लइका मन हांसत-खेलत एक-दूसर ऊपर पानी के बूंद गिरावत रहिन। बुजुर्ग मन समझाइन – "ए सिरिफ परंपरा नई, ए स्वास्थ्य अउ स्वच्छता के चिन्हा आय।"
ओही गांव म कोसराम नाव के एक गरीब किसान रहिस। फसल खराब होय के सेती घर के हालत कमजोर रहिस। फेर ओ कभू दाई ऊपर भरोसा नई छोड़े। जुड़वास के दिन ओ अपन घर के आखिरी तेल ले एक दीया जलाइस अउ कहिस – "दाई, धन-दौलत नई चाही, बस हमर परिवार ल सुखी रखिहा।"
बरखा बढ़िया होइस। खेत लहराय लागिन। फसल एतीक बढ़िया होइस कि कोसराम के घर म खुशहाली लौट आइस। गांव वाले मन कहिन – "दाई के कृपा तभे मिलथे, जब मन साफ होथे।"
धीरे-धीरे जुड़वास गांव के सबसे बड़े पर्व बनगे। दूर-दूर ले मनखे दर्शन बर आवन लागिन। जस गीत के स्वर गूंजे लागिस। छोटे लइका मन अपन ददा-दाई ले ए परंपरा सीखिन। माई-बहिनी मन नई पीढ़ी ल बताइन कि संस्कृति ल जिंदा रखे बर पर्व मनाना जरूरी होथे।
आज घलो जब आषाढ़ महीना आवथे, गांव के मंदिर म दीप जलथे, चौक पुरथे, नीम के डारा लहराथे अउ जस गीत गूंजथे—
"जुड़वास मनाये वो... आषाढ़ महीना मईया तोर जुड़वास मनाये ओ..."
ए गीत सिरिफ गाना नई, बल्कि छत्तीसगढ़ के माटी, आस्था, संस्कृति अउ लोकविश्वास के अमर पहचान आय। जेन समाज अपन परंपरा ल जिंदा रखथे, ओ समाज के पहचान पीढ़ी दर पीढ़ी बने रहिथे। शीतला दाई के जुड़वास आज घलो गांव-गांव म मनखे मन ल एक सूत्र म बांधके प्रेम, सेवा, शांति अउ सद्भाव के संदेश देत हे।
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