बन बन गईया चराए / गायक - अरुण यादव /cgjaslyrics
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गीत - बन बन गईया चराए
गीत लेबल-पारंपरिक
गायक - अरुण यादव
गीतकार - अरुण यादव
म्यूज़िक कंपनी - सुंदरानी भक्ति
वेबसाईट ऑनर-कैलाश पंचारे
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मुखड़ा
बन बन गईया चराये मोर कन्हैया बन बन बसुरी बजाये हो माँ
हो बन बन बसुरी बजाये हो माँ -2
बन बन गईया चराये मोर कन्हैया बन बन बसुरी बजाये हो माँ
हो बन बन बसुरी बजाये हो माँ -2
अंतरा -1
यहो कउन नगर के सुरहिन गईया कउन नगर चरेल जाये हो माँ
हो मईया कउन नगर चरेल जाये हो माँ
हो मईया कउन नगर चरेल जाये हो माँ
अंतरा -2
यहो बृंदा बन के सुरहिन गईया बनका गली में चरेल जाये हो माँ
हो मईया नका गली में चरेल जाये हो माँ
हो मईया कउन नगर चरेल जाये हो माँ
अंतरा -3
यहो कउन रंग गईया कउन रंग बछरू कउन रंग हावे चरवइहा माँ
हो मईया कउन रंग हावे चरवइहा माँ
हो मईया कउन रंग हावे चरवइहा माँ
अंतरा -4
यहो लाली रंग गईया सफ़ेद रंग बछरू श्याम रंग हावे चरवइहा माँ
हो मईया श्याम रंग हावे चरवइहा माँ
हो मईया श्याम रंग हावे चरवइहा माँ
अंतरा -5
पांच भगत मिल तोरे जस गाये जय जय बोले तुम्हारे हो माँ
हो मईया जयजय बोले तुम्हारे हो माँ
हो मईया जयजय बोले तुम्हारे हो माँ
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गीत का अर्थ (भावार्थ)
"बन बन गईया चराये मोर कन्हैया" एक अत्यंत मधुर और भक्तिमय छत्तीसगढ़ी जसगीत है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप और उनकी गौचारण लीला का वर्णन किया गया है। गीत में बताया गया है कि कन्हैया जंगल-जंगल गाय चराते हैं और अपनी बांसुरी की मधुर तान से पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।
गीत के अंतरों में वृंदावन की पवित्र भूमि, गायों का महत्व और भगवान कृष्ण के श्याम स्वरूप का सुंदर चित्रण मिलता है। भक्त माता से प्रश्न करते हैं कि ये गायें कहां की हैं, इन्हें कौन चराता है और इनका रंग कैसा है। उत्तर में बताया जाता है कि ये वृंदावन की गायें हैं और इन्हें स्वयं श्यामसुंदर कृष्ण चराते हैं।
अंत में भक्तजन मिलकर माता और भगवान की महिमा का गुणगान करते हुए जय-जयकार करते हैं। यह गीत भक्ति, प्रेम, गौसेवा और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण का संदेश देता है।
गीत की विशेषता
1. श्रीकृष्ण की गौचारण लीला का वर्णन
गीत में भगवान कृष्ण के गाय चराने वाले रूप को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जो भक्तों के मन को आनंदित करता है।
2. वृंदावन की पवित्रता
गीत वृंदावन की दिव्यता और वहां की भक्ति परंपरा को दर्शाता है। इससे श्रोताओं में आध्यात्मिक भाव जागृत होते हैं।
3. सरल और मधुर शब्द
छत्तीसगढ़ी भाषा के सहज और मधुर शब्द इस गीत को गांव-गांव में लोकप्रिय बनाते हैं।
4. गौसेवा का संदेश
गीत गायों के महत्व और उनकी सेवा के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न करता है।
5. सामूहिक भक्ति का स्वरूप
अंतिम अंतरे में भक्तों द्वारा मिलकर जय-जयकार करना सामूहिक भक्ति और एकता का प्रतीक है।
कथा : बन बन गईया चराये मोर कन्हैया
बहुत समय पहले वृंदावन की धरती पर एक गरीब ग्वाला परिवार रहता था। परिवार के पास कुछ गायें थीं जिनकी सेवा करना ही उनका जीवन था। हर सुबह वे अपनी गायों को लेकर जंगल की ओर निकल जाते थे।
एक दिन गांव के लोगों ने देखा कि उनकी गायें पहले से अधिक स्वस्थ और प्रसन्न दिखाई देने लगी हैं। दूध भी पहले से ज्यादा मिलने लगा। सभी आश्चर्य में थे कि आखिर ऐसा कैसे हो रहा है।
एक बुजुर्ग साधु ने बताया कि जब गायें जंगल में जाती हैं, तब स्वयं श्यामसुंदर कन्हैया उनके साथ रहते हैं। वे बांसुरी बजाते हैं और गायों को प्रेम से चराते हैं। उनकी मधुर धुन सुनकर पशु-पक्षी भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
गांव वालों को विश्वास नहीं हुआ। अगले दिन वे छिपकर जंगल पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि एक श्यामवर्ण बालक पीतांबर धारण किए हुए गायों के बीच खड़ा है। उसके हाथ में बांसुरी थी और उसके चेहरे पर दिव्य मुस्कान थी।
जैसे ही बांसुरी की धुन गूंजी, पूरा वन आनंद से भर गया। पेड़ों की शाखाएं झूमने लगीं, पक्षी मधुर स्वर में गाने लगे और गायें प्रेमपूर्वक उसके पास आकर खड़ी हो गईं।
गांव वालों को समझते देर नहीं लगी कि यह कोई साधारण बालक नहीं बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। सभी श्रद्धा से उनके चरणों में नतमस्तक हो गए।
कन्हैया ने कहा, "जो जीवों से प्रेम करता है, गौसेवा करता है और सच्चे मन से भगवान को याद करता है, उसके जीवन में सुख और शांति अवश्य आती है।"
उस दिन से गांव के लोगों ने आपसी भेदभाव छोड़कर प्रेम और सेवा का मार्ग अपनाया। वे प्रतिदिन भगवान का भजन करने लगे। गांव में सुख, समृद्धि और शांति का वातावरण बन गया।
आज भी जब यह गीत "बन बन गईया चराये मोर कन्हैया" गाया जाता है, तब ऐसा लगता है मानो वृंदावन की गलियों में फिर से कन्हैया अपनी बांसुरी बजाते हुए गायों को चरा रहे हों और भक्त उनके प्रेम में डूबकर जय-जयकार कर रहे हों।
जय श्रीकृष्ण।
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वेबसाइट ऑनर – कैलाश पंचारे



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