रंग झांझर मचगे रण मा गा – पंचू यादव | छत्तीसगढ़ी जस गीत Lyrics
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गीत - रंग झांझर मचगे रण मा गा
गायक - पंचू यादव
गीतकार - परमानन्द कठोलिया
म्यूजिक कंपनी - ji series
वेबसाइट ऑनर - कैलाश पंचारे
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मुखड़ा
रंग झांझर मचगे रण मा गा दुर्गा उमियागे -2
उड़ान - कोन ला खाही कोन ला बचाही काकर जिनगी के दिया बुताही -2
संग देबर काली आगे ना--
दुर्गा उमियागे
अंतरा -1
रक्तबीज सेना धर उमगे रण भुईया में गरजे गा
बघवा में बइठे दुर्गा दमके रक्तबीज ला बरजे गा
उड़ान - लहू के जारन भुईया ले बैरी, नहीं ते माता देहु गैरी-2
मद में बैरी बगियागे ना ---
दुर्गा उमियागे
रंग झांझर मचगे रण मा गा दुर्गा उमियागे -2
अंतरा -2
रक्तबीज के छाती ला भेदे भाला में दुर्गा हर गा
लहू चुचवावय रक्तबीज के उपजे बरतिया रण भर गा
उड़ान - काली ला दुर्गा हर तियारे ,रहिबे सहुअत तै होशियारे -2
खप्पर ला ओ उबाके ना ---
दुर्गा उमियागे
रंग झांझर मचगे रण मा गा दुर्गा उमियागे -2
अंतरा -3
धान लुए अस भूत्वा ला लुए काली टिकाये खप्पर गा
झोके लहू ला सपसप पिये काली माता जी भर गा
उड़ान - कतको ख़ुदागे पिचकागे बाचे खोचे भूलक भगागे-2
दुर्गा आगू में झपागे ना ---
दुर्गा उमियागे
रंग झांझर मचगे रण मा गा दुर्गा उमियागे -2
अंतरा -4
झपट के दुर्गा चुंदी ला धरे रक्तबीज ला काटे गा
काली माता खप्पर टेकाके लहू ला जीभ में चाटे गा
उड़ान - परमानन्द कठोलिया गोहारे ,पूजा पाये चैत कुंवारे -2
डीही डु संग पूजागे ना ---
दुर्गा उमियागे
रंग झांझर मचगे रण मा गा दुर्गा उमियागे -2
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गीत के अर्थ
ए गीत म देवी दुर्गा अउ काली माता के शक्ति अउ पराक्रम के वर्णन करे गे हवय। जब रक्तबीज असुर अपन लहू ले हजारों नया दानव पैदा करथे, त ओखर आतंक ले धरती कांप उठथे। तब माता दुर्गा युद्ध करथें अउ काली माता खप्पर ले ओकर लहू पी जाथें, ताकि एक बूंद घलो जमीन म नई गिरे। ए गीत धर्म के जीत अउ अधर्म के हार के प्रतीक आय।
गीत के महत्व
- नवरात्रि म गाये जइय्या शक्तिगीत
- दुर्गा अउ काली माता के संयुक्त शक्ति के वर्णन
- लोकसंस्कृति अउ चंदैनी गायन शैली के सुंदर उदाहरण
- बुराई ऊपर अच्छाई के विजय संदेश
- गांव के देवी-जागरण अउ जस कार्यक्रम बर उपयुक्त
रक्तबीज संहार – दुर्गा अउ काली माता के महागाथा
बहुत पुराना समय के बात आय। जब धरती म
अधर्म, अत्याचार अउ दानव मन के आतंक बढ़ गे रहिस। देवता मन घलो
डरे-सहमे रहिन। चारों कोती हाहाकार मच गे रहिस। ओ समय एक भयंकर असुर रहिस – रक्तबीज। ए असुर साधारण नई रहिस। ओकर पास एइसन
वरदान रहिस कि ओकर शरीर ले जेन बूंद लहू जमीन म गिरही, ओतकेच
नया रक्तबीज पैदा हो जाही। मतलब ओकर एक बूंद खून ले हजारों दानव बन जावत रहिन।
रक्तबीज अपन सेना संग तीनों लोक म आतंक
मचा दिस। गांव-गांव, जंगल-पहाड़, नदी-तालाब सब जगह ओकर अत्याचार बढ़गे।
देवता मन के पूजा बंद होवत रहिस। साधु-संत मन तपस्या नई कर पावत रहिन। धरती माता
कराह उठिस। सब देवता मिलके भगवान ब्रह्मा,
विष्णु अउ महादेव लगे पहुंचिन। सबो झन
एके बात कहिन – “अब ए संकट ले मुक्ति देय बर केवल आदिशक्ति माता दुर्गा ही
सक्षम हें।”
तब देवता मन अपन-अपन तेज अउ शक्ति ला
मिलाइन। ओ दिव्य प्रकाश ले एक अद्भुत रूप प्रकट होइस – मां
दुर्गा। माता के दस हाथ रहिस। हर हाथ म
अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र चमकत रहिस। सिंह ऊपर सवार माता के रूप देखके धरती कांप
उठिस। आंखी म अग्नि जइसन तेज, चेहरा म करुणा अउ क्रोध दुनों झलकत
रहिस।
माता दुर्गा रणभूमि बर निकलिन। ओतके बखत
आकाश म नगाड़ा बजय लगिस। देवता मन “जय भवानी,
जय दुर्गा” के
जयकारा लगाय लगिन। रक्तबीज घमंड म भरके हांसत रहिस। ओ कहिस – “कोन
मोला हराही? मोर लहू ले त हजारों सेना पैदा हो जाथे।”
फेर भयंकर युद्ध सुरू होइस।
माता दुर्गा अपन त्रिशूल, भाला
अउ तलवार ले असुर सेना ऊपर टूट पड़िन। रणभूमि म गड़गड़ाहट मचगे। दानव मन कट-कट के
गिरय लगिन। फेर जइसेच रक्तबीज घायल होवत रहिस,
ओकर लहू जमीन म गिरत रहिस अउ हर बूंद ले
नया दानव पैदा हो जावत रहिस। देखते-देखते पूरा रणभूमि लाखों असुर ले भरगे।
देवता मन फेर घबरा गिन। माता दुर्गा समझ
गइन कि ए युद्ध सामान्य नई आय। जब तक रक्तबीज के लहू जमीन म गिरत रही, तब
तक ओकर अंत संभव नई रहय।
तब माता दुर्गा अपन भीतर के रौद्र शक्ति
ला जागृत करिन। ओ शक्ति ले प्रकट होइन –
मां काली।
काली माता के रूप अत्यंत भयानक रहिस।
कारी देह, लाल आंखी, लम्बा जीभ, गले
म मुंडमाला अउ हाथ म खप्पर। ओखर रूप देखके असुर सेना कांप उठिस। धरती डोलय लगिस अउ
आकाश म बिजली चमकय लगिस।
माता दुर्गा काली माता ला आदेश दिन –
“हे काली! अब ए दानव के लहू ला जमीन म
गिरने झन देबे।”
तब काली माता रणभूमि म कूद परिन। माता
दुर्गा जइसे-जइसे रक्तबीज ऊपर वार करथें,
काली माता ओकरे लहू ला खप्पर म भर-भर के
पी जाथें। एक बूंद घलो जमीन म नई गिरे। रक्तबीज तड़पत रहिगे। ओकर शक्ति धीरे-धीरे
कम होय लगिस।
रक्तबीज अपन पूरी ताकत लगाइस। ओ गर्जना
करिस, बड़े-बड़े अस्त्र चलाइस,
फेर माता दुर्गा अउ काली के संयुक्त
शक्ति आगे ओकर एक नई चलिस। आखिरकार माता दुर्गा अपन त्रिशूल सीधे रक्तबीज के छाती
म भोंक दिन। ओ जोर ले चिल्लाइस अउ जमीन म गिर परेस। काली माता ओकर आखिरी बूंद लहू
घलो पी गइन।
ए तरह अधर्म के अंत होइस अउ धर्म के
विजय।
रक्तबीज के मरतेच आकाश ले फूल बरसय
लगिस। देवता मन प्रसन्न होगिन। चारों कोती “जय माता दी” के
जयकारा गूंज उठिस। धरती म फिर से शांति लौट आइस। नदी-नाला, जंगल
अउ गांव फिर ले खुशहाल होगिन। साधु-संत मन तपस्या करे लगिन। देवता मन माता दुर्गा
अउ काली के स्तुति करिन।
छत्तीसगढ़ म ए कथा ला बहुत श्रद्धा ले
सुनाय अउ गाये जाथे। जसगीत, चंदैनी अउ देवी जागरण म ए गाथा के विशेष महत्व हवय। गांव के
कलाकार मन रणभूमि के दृश्य, दुर्गा के वीरता अउ काली माता के रौद्र रूप ला गीत-संगीत म
जीवंत कर देथें।
ए कथा केवल युद्ध के कहानी नई आय, बल्कि
ए संदेश देथे कि जब-जब अधर्म बढ़ही,
तब-तब शक्ति के रूप म माता अवतार लेके
संसार के रक्षा करहीं। रक्तबीज मनखे के भीतर के अहंकार, लालच
अउ बुराई के प्रतीक आय। अउ माता दुर्गा शक्ति,
साहस अउ न्याय के प्रतीक हें।
आज घलो नवरात्रि के समय जब ढोल-नगाड़ा
बजथे अउ जसगीत गूंजथे, तब लोग मन ए महागाथा ला याद करथें। माता के आराधना करके अपन
जीवन ले बुराई दूर करे के संकल्प लेथें।
एही कारण ए गीत अउ कथा छत्तीसगढ़ी
लोकसंस्कृति म विशेष स्थान रखथे। ए केवल भक्ति नई,
बल्कि साहस, धर्म
अउ विजय के अमर गाथा आय।



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