दाई तोर अचरा मा/छत्तीसगढ़ी भक्ति जस गीत/गजेंद्र ठाकुर

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गीत -दाई तोर अचरा मा 

गायक - गजेंद्र सिंह ठाकुर 

गीतकार -प्रेम उस्ताद 

www.cgjaslyrics.com 

वेबसाइट ऑनर-के के पंचारे 

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मुखड़ा 

दाई तोर अचरा मा फुले फुले गजरा मा 

दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना 

उड़ान - अचरा म दाई अचरा म गजरा म दाई गजरा म 

ये दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना

दाई तोर अचरा मा फुले फुले गजरा मा  

दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना 

अंतरा -1   

नव महीना तै कोख म राखे गठरी सही गठियाये 

दुःख पीड़ा ल सहिके माता फेर मोला जन्माये

अपन लहू गोरस ल पिया के चोला मोर हरियाय

लाघन भुखन रहिके तैहर मोला तै हा खवाये 

मोला तै हा खवाये वो दाई मोला तैहा खवाये 

उड़ान - मया केसजरा म बधे तोर पखरा म

दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना

दाई तोर अचरा मा फुले फुले गजरा मा  

दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना 

अंतरा -2   

मै तोर बेटा तै महतारी मोला झन दुरिहाबे 

अपन मयारू ये बेटा बर मया सदा बरसाबे 

सतवंतिन तै सत के दाई सत के रस्दा देखाबे 

चाहे कोनो मुश्किल होये रस्दा झन भटकाबे

रस्दा झन भटकाबे हो माया रस्दा झन भटकाबे-2  

उड़ान - बंधे तोर बंधना म बादर के बदरा म 

दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना

दाई तोर अचरा मा फुले फुले गजरा मा  

दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना  

अंतरा -3   

ममता के मूरत तैहस माता दुनिया तोला जाने 

सबके सुनथस तैहर माता दुःख पीड़ा पहिचाने

बंधना म बंधे तोर माया दुनिया तोला  जाने 

माता कभू कुमाता नई होये वेद पुराण बखाने 

वेद पुराण बखाने हो माता वेद पुराण बखाने -2 

उड़ान - प्रेम के चखरा म लिखे जस पचरा म 

दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना

    दाई तोर अचरा मा फुले फुले गजरा मा  

दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना 



गायक परिचय – गजेंद्र सिंह ठाकुर

नाम: गजेंद्र सिंह ठाकुर

विशेषज्ञता: छत्तीसगढ़ी देवी‑भक्ति गीत, फाग गीत, लोक-संगीत

लोकप्रिय गीत: ,  Jab Jhulay Mata 

🌟 संक्षिप्त जीवनी:

  • छत्तीसगढ़ के लोक-संगीत जगत मे गजेंद्र सिंह ठाकुर एक प्रतिष्ठित नाम हैं।

  • वे विशेष रूप से देवी-भक्ति गीत (जस गीत) और फाग गीत (होली से जुड़े लोकगीत) गाते हैं, जो ग्रामीण जीवन, भक्ति और संस्कृति की गहरी अनुभूति को दर्शाते हैं।

  • उनके कुछ प्रसिद्ध भजन हैं:

    • नै मंगव रुपिया दाई” – ममता और त्याग 

    • जब झूले माता” – देवी भक्ति गीत, गहरी आध्यात्मिकता से ओत‑प्रोत

    • 🎤 गायकी की खासियत:

  • उनकी आवाज में ग्रामीणः सहजता, भावुकता और लोक-रस भरा होता है।

  • संगीत अरेंजमेंट में पारंपरिक वाद्य (मंदव, ढोलक आदि) का इस्तेमाल होता है जिससे सुनने वालों को संस्कृति से जुड़ाव महसूस होता है।

  • गीतों में देवी और मातृत्व भावनाओं का प्रतिबिंब उनके सुरों में जान फूंक देता है, श्रोताओं को सीधे हृदय से जोड़ता है।

                   

छत्तीसगढ़ी भाषा कहानी 

छत्तीसगढ़ के गाँव "सेमरिया" म रहय एक अबड़ मया दार महतारी "सीता बाई"। गांव के मनखे ओकर ला "दाई" कहिके बुलावत रहिन। ओकर अंचरा म गजरा फुले जइसे मया, करुणा अउ त्याग के महक रहय। हर मनखे ला अपन मया म बंध के रखे रहिस। इही दाई के ममता भरे अंचरा म जउन दुनिया समाय हवय, ओकरे ऊपर ए कहानी आय।


🧵 भाग 1: दाई के गजरा म समाय मया

दाई के सिर के अंचरा म रेंगथे उज्जर-सुहावन गजरा, जेमा गुलाब, चमेली अउ बेल के फूल लगे रहिथें। ये गजरा सिरिफ सिंगार के नई, मया के प्रतिक रहिस। हर बिहान दाई अपन सिर म ओढ़नी बांधथे, अउ वो म गजरा लगाथे। गांव के लइका-बच्चा, बूढ़ा-जवान सब जानत रहिन - जइसे गजरा म सुगंध हवय, वइसने दाई के अंचरा म ममता के महक।

दाई बिना कहे भूखे ला खवाथे, रोवत लइका ला गोदी म लेथें, थकाय बुजुर्ग ला अपन गोड़ म जगह देथें। वो लइका लोगन के गोदी म झुलावत रहिथें, कहिनी सुनावत रहिथें – जइसे सहर के स्कूल नई गे लइका घलो ए दाई के संग म घलो जिनगी के घलो सिख लेवत रहिन।


🧵 भाग 2: नौ महीना के बंधन – जनम के पीरा

दाई अपन बेटा "राजू" के जनम के बात बताथे – “तै जानथस राजू, तै मोर कोख म 9 महीना रहिस, एक दिन घलो चैन नई मिलिस। तभे मंय हांसत रहेव, तभे मंय गावत रहेव। तोर लइका के अंग म पीरा होथे त मोर अंग ल कांपथे।”

राजू अपन महतारी के पीरा सुनके चुप हो जाथे। मंझनिया के घाम म ओकर आँखी भींज जाथे – काबर की ये पीरा के दास्तान, कभू वो महूसूस नई कर पाय।

दाई आगू कहिथे – “राजू, मंय तहाँ ल जनम देवय बर खुद के लहू ला दूध म बदलीस, खुद भूख म रहिके तैं ला खवाइस, मोर अंचरा म तैं खेलीस। मंय झन पुछेव, बस सब कुछ करत रहेव।”


🧵 भाग 3: ममता – जो दूरी नइ मानय

राजू अब जवान हो गे रहय। वो नौकरी के सिलसिला म शहर चल दे रहिस। दाई के घर सुन्ना हो गे रहिस, फेर ओकर अंचरा म अब घलो वो गजरा के महक रहय। दाई रोज पूजा करत – “हे मइया, मोर बेटा के संग रहिबे, ओकर मया बरसो, अउ वो रद्दा ले भटके नइ।”

राजू एक दिन फोन म कहिस – “मंय व्यस्त अंव दाई, फुरसत नइ मिलत।”
दाई हांस के कहिथे – “बेटा, तैं तोर जिनगी बनावत हस, फेर अपन जड़ नइ भुलाय।”

दाई रोज एको बात कहिथे – “बेटा मंय तोर माई अंव, अपन बेटा ला कभू दूर नई कर सकंव। मया के बंधना अइसन होथे – जेन धरती ला आकाश ले जोड़ देथे।”


🧵 भाग 4: सत के रद्दा अउ ममता के पाठ

एक दिन गांव म महामारी के खबर आय। गांव बंद हो गे, शहर वाला लइका घलो नइ आवत रहिन। फेर दाई बिना डरे सब घर म बासी-भात, पेज अउ हर्रा-गुड़ बांटे बर निकल पड़िस। लइका-बच्चा ओकर अंचरा म छिप जाथे, अउ गांव वाला कहिथें – “दाई तो भगवान के रूप आय।”

राजू, जब खबर सुने रहिस कि दाई बीमार हो गे हवय, वो हड़बड़ावत गांव लौट आइस। मां के पलंग पास जाके कहिस – “माफ कर दे दाई, मंय तोर मया के कदर नई कर पाए।”

दाई मया भरे नजर ले कहिथे – “बेटा, मया कहूं बिके नइ, मया बांटे जाथे। जेन अंचरा म गजरा लगे हे, ओमा दुनिया समाय हवय, अउ ओमा मोर बेटा घलो।”


🧵 भाग 5: अंचरा के गजरा – भक्ति के रूप

अब राजू रोज माई के अंचरा म गजरा बांधथे। गांव के मंदिर म जाके माई खातिर दीप जलाथे, अउ मइया ला कहिथे – "हे दाई, जइसे मोर महतारी मया बरसाइस, वइसने तोर मया दुनिया म सबो मां म बरसत रहय।"

राजू अब शहर म रहिके घलो अपन माई ला फोन करत रहिथे, अउ हर तिहार म गांव आके माई के अंचरा म गजरा लगाथे। अब ओकर जिनगी म माई के ममता, धरम, अउ मया के महक समाय हवय।


निष्कर्ष:

"दाई तोर अचरा मा फुले फुले गजरा मा, दुनिया हा समाये ओ---वो माँ मया म बधाये हावे ना" – ए सिरिफ भजन नई, ए महतारी के असीम मया, त्याग, धरम अउ करुणा के बखान आय। जऊन माई अपन जिनगी ला बेटे बर अर्पित कर देथे, ओकर अंचरा म दुनिया घलो समा जाथे।

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