लक्ष्मी हे बेलपतिया गीतकार -बालक राधे पारकर
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गीत - लक्ष्मी हे बेलपतिया
गायक -नौतम दास मानिकपुरी
गीतकार -बालक राधे पारकर
म्यूजिक कंपनी -मनीष यादव
वेबसाइट ऑनर -के के पंचारे
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मुखड़ा
लक्ष्मी हे बेलपतिया जेला शिव मा चघाये हां
उड़ान - लक्ष्मी म अपन थन ला काटे भुइयां म गिराये हां
लक्ष्मी हे बेलपतिया जेला शिव मा चघाये हां
अंतरा -1
बेल रुख के अमर कहानी सहुअत हे परमानी
सबके के तरैया ला कहिथे पानी सुनहु चतुर सुजानि
विष्णु के अंगूठा ले निकले भवानी उहि पानी हे भवानी
जेला कहिथे गंगा रानी बहिनी ओकर तिरवेनी
उड़ान - विष्णु संग गंगा ला देख पाये लक्ष्मी हा रिसाये हा
लक्ष्मी हे बेलपतिया जेला शिव मा चघाये हां
अंतरा -2
लक्ष्मी के मन मा ईर्षा झपाये विष्णु ला छोड़ के जाये
शिवशंकर तप ले उचाये कतको दिन ला पहाये
परगट भोला नई तो आये लक्ष्मी जब खिसियाए
अपने तन काटे अलगाये भोला हा परगट आये
उड़ान - मांग ले लक्ष्मी तै वरदाने भोला हां बताये हां
लक्ष्मी में बेलपतिया जेला शिव म चघाये हां -2
अंतरा -3
नई होवय विरथा तन ला जनाये भुइँया मा लक्ष्मी दबाये
लक्मी के तन बिन रुख ला जगाये तीन ठन पाना रहाये
जेन हा जेन ये बेल पाना चघाये मन के मनौती मनाये
रोग राई ला शिव बहिराये तब हरी लक्ष्मी ला पाये
उड़ान - बालक राधे रोज बिहनिया पानी बेल चघाये हां
लक्ष्मी में बेलपतिया जेला शिव म चघाये हां -2
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गीत के अर्थ (Meaning in Chhattisgarhi)
ए गीत म देवी लक्ष्मी के वो रूप ला बताय गेहे जेन मन ईर्षा अउ क्रोध के कारण अपन तन ला त्याग देथें, अउ ओकर देह ले बेल रुख के उत्पत्ति होथे। बेल रुख ला भगवान शिव बर सबसे पवित्र माने जाथे। गीत के पंक्तियाँ बताथें कि — “लक्ष्मी हे बेलपतिया जेला शिव मा चघाये हां” — मतलब, बेल रुख म खुद लक्ष्मी के स्वरूप बसत हे, अउ ओला शिव भगवान ला चढ़ाय जाथे ।
🌿 गीत के महत्व (Importance)☘️
गीत के उद्देश्य (Purpose):
ए
जसगीत
के
मुख्य
उद्देश्य हे
–---
1.
लोकमानस म
देवी
लक्ष्मी अउ
भगवान
शिव
के
कथा
ला
जीवंत
बनाना।
2.
बेल
पत्ता
चढ़ाय
के
धार्मिक महत्व
समझाना।
3.
भक्ति,
त्याग,
ईर्ष्या अउ
ज्ञान
के
संदेश
देना।
4.
छत्तीसगढ़ी भक्ति
संस्कृति अउ
परंपरा
ला
जिवंत
रखना।
कथेन सुरू आत
एक बखत के गोठ हावय। जब देवता मन ऊपर स्वर्ग मं रहत रहिन, त ओ बखत मं देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु के संग रहत रहिन। गंगा देवी घलो उहिच जग मं रहत रहिन। अब भगवान विष्णु के संग गंगा देवी के नजदीकी देखके लक्ष्मी के मन मं ईर्षा के अगिन जलगे।
लक्ष्मी सोचिन — “मंय त धन के देवी हंव, फेर गंगा के प्रति ये काबर जियादा लगाव?”
ए सोच सोच के ओ मन मं रिस बसगे।
💧 ईर्षा ले दुखी लक्ष्मी के मन के पीरा
वो दिन भर मं चुप रहत रहिन, न हसी , न बोलिन। भगवान विष्णु पूछिन – “काय होगे लक्ष्मी? काबर मुंह उतर गे?”
लक्ष्मी जवाब देन – “कुछु नई, बस मन मं थोरिक खिन्ना हे।”
पर अंदर अंदर ईर्षा के आग ज्यादा भड़कत गे। अंत मं ओ अपन स्थान छोड़के अकेले चल दीन, अउ भगवान विष्णु के दरबार त्याग दीन।
🕉 शिव भगवान के तप अउ बेल रुख के जन्म
अब लक्ष्मी अकेले- अकेले भटकत भटकत कैलास पहाड़ के पास पहुँच गे। ओतका भगवान शिव गहरे ध्यान मं तप मं मगन रहिन।
लक्ष्मी मन मं सोचिन — “अब मोर तन के का मोल रहिगे, मंय अपन गलती ला सुधारना चाहंव।”
तब ओ अपन शरीर के अंश ला काट के धरती मं गिरा दीन।
जिहां ओ शरीर के टुकड़ा गिरिस, उहिचे बेल रुख के जन्म होगे।
धरती कांप गे, हवा बहिन लगिस, अउ देवता मन कहिन — “ये बेल रुख मं देवी लक्ष्मी के अंश बसगे हे।”
🌿 बेल रुख के महिमा
बेल रुख के हर पत्ता तीन भाग मं होथे —
एक भगवान ब्रह्मा, दूसर विष्णु, अउ तिसर शिव के प्रतीक हे।
तभी ले बेल रुख ला त्रिदेव के रूप मं पूजना सुरू होगे।
शिव भगवान जब तप ले उठिन, त ओ बेल रुख ला देख के मुस्कुरा दीन अउ कहिन –
“ए रुख मं देवी लक्ष्मी के पवित्र तन बसत हे, जेन मन सच्चा भाव ले बेल पतिया ला मंय म चढ़ाही, ओ मन के घर मं सुख-समृद्धि बसही।”
🌸 गीत के भाव
नौतम दास मानिकपुरी के गाये गीत मं ये कथा ला बड़े सुंदर तरीका ले गाथे —
“लक्ष्मी हे बेलपतिया, जेला शिव मं चघाये हां,
विष्णु संग गंगा ला देख पाये, लक्मी हा रिसाये हां…”
ए पंक्ति मं साफ कहे गे हे कि, देवी लक्ष्मी जब गंगा के संग विष्णु ला देखिन, त रिसा गिन अउ ओ रिस मं अपन तन काट के धरती मं गिरा दीन।
🌿 बालक राधे के गोठ
गीत के आखिरी पंक्ति मं गीतकार बालक राधे पारकर अपन भक्ति भावना बताथें –
“बालक राधे रोज बिहनिया, पानी बेल चघाये हां…”
मतलब, वो रोज बिहनिया उठके बेल रुख मं पानी देथें, पूजा करथें अउ ओ बेल पतिया ला शिवलिंग मं चढ़ाथें।
ए सच्ची भक्ति के निशानी हे।
बालक राधे कहिथें — “बेल रुख मं लक्ष्मी के रूप हे, अउ जब मंय ओला शिव मं चढ़ाथंव, त मोला लागथे जइसे लक्ष्मी-शिव के मिलन होत हे।”



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